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Archive for મે, 2011

77-तू…….

तू…….

बच्चा मांगे चांदको,

मेरा मन मांगे तू,

ए कैसी जूस्त-जू है,

न चांद मिला है न तू.

 

नदीकी भीनी रेत पर,

फिसल गया है तू,

किसीने देखातो नहीं,

क्युं रो रहा है तू.

 

जमानेभरकी दुवाओं लेकर,

जब जी रहा है तू,

लंबी सफरके अंतमे खूब,

थका हुवा है तू.

 

“साज” को किसीने तोडा है,

क्या सुर निकालेगा तू,

वो कान बंध करके बैठा है,

गाना कैसे सुनायेगा तू.

“साज” मेवाडा

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